एक और ज़बान
और एक कहानी
पहली ज़बान या दूसरी? पहले पहली, अब दूसरी? बुढ़ापे में कोहनियाँ मार के आगे बढ़ती, अपना पहला दर्जा वापस ऐंठने कि होड़ में।
तीसरी, चौथी भी हैं। पंजाबी, उर्दू, तेलगु, तमिल। तमिऴ्, ऴ्, ऴ्। कक्षा आठ में बैठी संस्कृत अभी भी रामः रामौ रामाः का जाप कर रही है। चलते फिरते थोड़ी सी मैन्डरिन भी तो पकड़ ली। इनमें से कौनसी ज़बान मेरी? मैं किसकी?
रूमी बोले ख़ुदा कि ज़बान सिर्फ़ ख़ामोशी है, बाक़ी सब फूहड़ तर्जुमे हैं।
एक कहानी कि पहली लाइन सुनाई देती है - हिन्दी, उर्दू , पंजाबी में। फिर हफ़्तों लगते हैं उसे अंग्रेज़ी में उतारने में। पर वो बात नहीं आती। कहानी पूरी हो जाती है लेकिन पहली लाइन फिर भी अटकती रहती है, खटकती रहती है। किसको? मुझको, क्यूंकी और किसी ने तो अभी तक पढ़ी नहीं।
एक ज़बान से दूसरी ज़बान फांदने में क्या क्या गिर गया? क्या कुछ मिला भी? इस कूद फांद में कहानी कहीं और तो नहीं पहुँच गई?
एक सवाल ये भी है कि ये कहानी, जो घटी हिन्दुस्तानी में, इसे अंग्रेज़ी में उतारा ही क्यूँ? क्या ज़रूरत? क्या वजह? सवाल बढ़िया है।
और अब ये जो हिन्दी संस्करण है, जो अंग्रेज़ी की दुनिया घूम के वापस आया है, ये सही जगह land किया है या कहीं और का कहीं और पहुँच गया?
अब तो गुस्सा भी अंग्रेज़ी में आने लगा है। इस बात का गुस्सा अलग आता है, हिन्दी में, Google Translate कर करके। आते आते आते ठंडा हो जाता है, थक जाता है।
एक ज़बान और दूसरी ज़बान के परे एक मैदान है, मैं वहीं मिलूँगी।
अभी के लिए, ये - एक कहानी का तर्जुमा, एक तर्जुमे कि कहानी।
तमाशा
हमें एक दूसरे को जानने में वक़्त लग गया। बाबा के भीतर छुपे इंसान से जब तक मेरी मुलाक़ात हुई, तब तक बाबा रिटायर हो चुके थे। पहली मुलाक़ात आखिरी निकली।
अपनी पैंतीस साल की डॉक्टरी में बाबा ने एक भी दिन छुट्टी नहीं मारी थी। लगे रहते थे सुबह से शाम, सारे मरीज़ों के सारे मर्ज़ दूर करने में। या शायद अपने मन के खोखले पन को भरने में, जो कि भरता ही नहीं था, बाबा कितने ही मुफ़्त के इलाज क्यों ना कर दें या हर खाने के बाद कितने ही पेड़े क्यों न खा लें। क्योंकि बाबा जो भी करते, माती कुछ और निकाल के ले आते जो करना रह गया। बाबा कितना भी करते, माती कहते “थोड़ा होर करना सी”, या “थोड़ा जेया कम”। बाबा सब सुनते, हाथ जुड़े, गर्दन झुकी, “क्या हुक्म है मेरे आका, आज के लिए, कल के लिए, अगले हफ्ते के लिए, सारी उम्र के लिए?”
जो माती ने कहना “ख्लो जा”, तो कूद के खड़े हो जाते, अटैंशन। माती ने बोला “डॉक्टर”, तो बाबा ने अपनी साहित्य की डिस्टिंक्शन को हाँजी की आग में स्वाहा करके मेडिकल कॉलेज का फ़ॉर्म भर दिया। बाबा का दिल रेणुका के नाम से रौशन होता था, लेकिन माती ने कह दिया अमृता, और बाबा ने उस रौशनी को फूँक मार के, दिल के एक अंधेरे कोने में खोंस के, ताला लगा के, चाबी माती के चरण कमलों में रख दी। अगर कभी बाबा के मुंह से निकल गया की “चलो कही घूमने चलते हैं”, तो माती ने कहना, “एन्ना मरीज़ां नूँ कौन वेखेगा?” और बाबा ने कहना “बिल्कुल जी”।
माती कहते थे कि मन एक बंदर जैसा है। बाहर मिट्टी में, गली के बच्चों के साथ खेलना चाहता है। पर हमें और बहुत काम है। मन को डंडा मार के काबू में करना सीखो।
“बंदर को चोट लग जाएगी,” मैं बोलती।
उनकी भौहें पास आ जाती। जबड़ा कस जाता। बस फिर ...इति श्री पार्टिशन गाथा आरंभ।
“जदों असी पुरानी दिल्ली उतरे, मेरे इक हथिच सूटकेस सी, दूजेच मन्नू। सूरज ने मेरी चुन्नी फड़ी होई सी।”
“आप दो सूटकेस लेकर आए थे,” मैंने उन्हें याद दिलाया।
मेरी बात उन्होंने नहीं सुनी, या सुन के अनसुनी कर दी।
“चौदां कमरेयाँ दी कोठी सी साडी। कताबां ई कताबां। सारा कुछ ओथे ई छड्ड आये। ऐ सारा शुरू तों शुरू कित्ता,” अपनी लंबी-लंबी, पतली-पतली उंगलियों से कमरे की दीवारों की तरफ़ इशारा करते हुए कहा। “कंट्रोल दे बिना ते नई ना होना सी।”
हर बार वही कहानी। आगे का मुझे याद हो गया था।
“मैं ते चल्ले जाना ऐ। तूं ऐ गल अपनी मोटी अकलच पा लै। जे तूं मन नूं काबूच नई कित्ता, मन ने तैनूं अपने काबूच कर लैना ऐ।”
यह बात हम हज़ारों बार सुन चूके थे। लेकिन फिर भी जब भी माती शुरू करते, सब बैठ जाते, प्रवचन सुनने। सब, केवल मन्नू चाचा को छोड़ के। वो कनाडा में रहते थे और कभी-कभी दिल्ली आते थे मिलने। और माती की कहानियों पे हंस देते थे।
उनके आने से रौनक आ जाती थी। मैं फट से उनकी गोदी में बैठ जाती थी। वो मेरे बालों में हाथ फेर के गाने गाते थे, और मैं सो जाती थी।
उनकी पीठ पीछे, माती सब को बताते फिरते की मन्नू की आवाज़ आवाज़ नहीं, एक कंपन है, एक लहर है जो सीधे अंतर आत्मा तक जाती है। उनके सामने उनको झूठ मूठ डांटने का नाटक करते, “कम करन दे, डिस्टर्ब ना कर”। सब को साफ़ दिखती ये नौटंकी। बस बाबा ही इस को सच मान लेते, उनके दिल को थोड़ी ठंड पड़ती। रहे मन्नू चाचा, तो वो हंस देते।

बंदरों से मुझे डर लगता था। मैं शाम को ऊपर वाली बैल्कनी में खड़ी होकर देखती थी की कब बाबा का लमरेटा गली में मुड़ेगा। कभी-कभी एक मदारी आता था साइकिल पे, पीछे कैरियर पे बंदर बिठाकर। उसके डमरू का डक-डक-डक सुन के पार्क में खेलते बच्चे उसके आसपास जमा हो जाते थे। सबसे पहले बंदर दो पैरों पर चल के दिखाता था। फिर, मदारी ज़ोर से, कटक कर के डमरू घुमाता, और बंदर छलांग लगाता और भीड़ ताली बजाती। मदारी बोलता, “सलाम कर,”, बंदर अपना हाथ सर पे रख लेता। “बेटा, नमस्ते कर”, और बंदर दोनों हाथ जोड़ लेता। आखिर में मदारी अपने झोले से एक केला निकालता था। एक हाथ में केला, दूसरे में टोपी पकड़ के पूछता, “ कौन सा लेगा जमूरे?” जमूरा अच्छे-बच्चे की तरह टोपी ले लेता और चल पड़ाता बख्शीश इकट्ठी करने।
मेरी जगह सबसे सही थी। नीचे कितनी ही भीड़ हो, मुझे सारा तमाशा साफ़ दिखता था और पैसे भी नहीं देने पड़ते।।
नाक से बोलता था मदारी। उसकी करारी आवाज़ पूरे मोहल्ले में गूंजती थी।
“दिल खोल के दो, लगाओ बटुए पर ज़ोर,
जो देखे तमाशा और देना पैसा,
वो कहलाए...
हरामख़ोर।”
ताल गड़बड़ थी पर मदारी उसे लड़खड़ाने नहीं देता था। वो फिसले, इससे पहले ही वो उसे अपनी बुलंद आवाज़ पे बिठाकर हवा में ऐसे उड़ा देता था के वो दूसरी, तीसरी मंजिल पार करके, सीधे आकाश बादलों से टकरा के वापस आती थी। हरामख़ोर सुनते ही मैं पर्दे के पीछे हो जाती, लेकिन मेरे अंदर के हरामख़ोर से रहा नहीं जाता था। वो परदे के पीछे से ज़रूर देखता की मदारी ने उसे देख तो नहीं लिया। हर बार मदारी उसी को देख रहा होता।
उसकी वो करारी आवाज़ मेरे मन में बैठ गई। आज भी इतनी साफ़ सुनाई देती है मानो बाहर गली में बैठा, अपना सामान साइकिल पर लाद रहा हो।
*
जब मन्नू चाचा आप नहीं होते थे तब उनके चर्चे होते। माँ बताती थी की कैसे माती ने कपड़े बुन के, घर-घर बेच के घर चलाया। सरकार का मुआवज़ा कम पड़ता था। बड़ों के स्वेटर, बच्चों के लिए बूटियाँ, स्कार्फ़, फुंदनों वाले। माती एक गठरी लेके आगे-आगे, और एक गठरी बाबा लेके पीछे-पीछे। मन्नू चाचा बढ़इयों के बीच उकड़ू बैठकर उनके साथ बीड़ियाँ फूंकते थे। मैट्रिक फ़ेल हो गए दो बार। बाबा ने सिलाइयाँ उठा लीं। दोनों देर रात तक बुनाई करते। मन्नू चाचा ने स्कूल छोड़ दिया मौसिक़ी सीखने के लिए। बाबा ने माती की आधी गलियां पकड़ ली ताकि ज़्यादा दरवाज़े खटखटा सकें। ये दोनों अपनी गठरियाँ खोलकर सामान दिखाते, मन्नू चाचा ड्योढ़ी पर बैठे, लोगों को अपने गीतों से रिझाते। वो जितना अपने मन की करते, लोग उनको उतना ही ज़्यादा प्यार करते। बाबा ने कहा “मन्नू ख़ुदग़र्ज़ है”, तो माती ने कहा, “छोट्टी गल्लां छोट्टे लोग करदे ने,” और बाबा ने कहा, “मैनूं माफ़ कर दो।”
चाचा ने बाबा को भी अपने पैंतरों में खींचने की कोशिश तो की। माती के पर्सी से सिक्के चुराना, बिना बताए नौटंकी देखने जाना। पर बाबा की अकल मोटी नहीं ना थी। अगर माती आसपास नहीं होते डंडा मारने के लिए, तो बाबा बन जाते डंडा, खुद को और चाचा को मार के रास्ते पर लाने के लिए। मेहनत और जिम्मेदारी की तरफ़, रोज़ी-रोटी कमाने की तरफ़, संगीत, कला से दूर, खुशी से दूर। बाबा मन्नू चाचा के साथ कभी नहीं गए। मगर कभी उनकी चुगली भी नहीं की।
बस एक शौक था बाबा को - नज़्मों का। जब भी दो चार आने इकट्ठे हो जाते तो स्टेशन के पास वाली रद्दी की दुकान में जाकर नज़्मों की किताबें छान के ले आते। लिखते भी थे। रात के अंधेरे में, तकिये के नीचे, उर्दू में।
एक बार दोनों भाइयों के बीच बात हद से गुज़र गई। और जो हुआ वो यूं, कि मन्नू चाचा ने बिना बताए बाबा के एक नज़्म, एक कॉम्पिटिशन में जमा कर दी। और वो जीत गई। पहला इनाम। बाबा आग बबूला हो गए कि “मेरी मर्ज़ी बग़ैर मेरे काम को हाथ कैसे लगाया?” अखबार को फाड़ के फेंका और चाचा को धक्का दिया। चाचा का सर बिस्तर के कोने पर पड़ा और खून ही खून, अस्पताल, टांके, सब। जैसे ही चलने लायक हुए, चाचा भाग गए। प्रायश्चित के चक्कर में बाबा ने मेडिकल के इम्तिहान में जान लगा दी और घुस गए डॉक्टरी की दुनिया में। किसी को किसी से खबर मिलती रही कि मन्नु बम्बई चला गया। फिर लाहौर में दिखा, फिर इंग्लैंड, स्कॉटलैंड, दुबारा लाहौर और फिर टोरोंटो। उसके बाद कहीं और नहीं पाया गया। बस गया वहीं।
पर जब मन किया आ जाते थे दिल्ली बिना बताए। उनके आते ही माती ने तफ़री में कड़ी और करेले बनाने, अपना बिस्तर उनको दे देना, रात भर जागना के “मन्नु आए, करेले खाए”। बाबा ने भी जगे रहना। माती के लिए गद्दा लगाना, उनका तकिया, खेस। मन में सवाल घूम-घूम के गांठों में उलझते जाते, लेकिन चद्दर ऐसी कस के बिछानी की एक भी सिलवट ना रहे, गांठें उफन-उफन कर गले तक तो आनी, पर मुंह से यही निकलना की “तुस्सी सौं जाओ”।
कभी भी खाली हाथ नहीं आए चाचा। मेरे लिए टॉफ़ियां लाते थे, चिनार के पत्तों के शक्ल की, मीठी-मीठी, चिपचिपी। माती की टांगों के लिए चुंबक, बाबा के लिए बढ़िया फ़ाऊंटेन पेन, विलायती स्टेथोस्कोप। बाबा की शादी में बिन बुलाए, बिन बताए आ गए, डल लेक की दो टिकटें लेकर। माँ की विदाई के वक़्त ‘बाबुल मोरा’ ऐसा गाया कि माती तक के आंसू आ गए।
वो फ़ाऊंटेन पेन कभी इस्तेमाल नहीं हुआ, ना ही वो टिकटें। वो स्टेथोस्कोप भी मेरे पास ही आया। दोपहर को जब मैं बोर होती थी तो उससे अपनी गुड़िया का चेकअप करती थी। मैं भी बचपन से ही डॉक्टर बनने वाली थी। दस साल की उम्र में मैंने सब का बी.पी. चेक करना सीख लिया था। जब-तब माँ पूछती थीं, “बड़ी होकर क्या बनना चाहोगी?” और मैं फट से कहती “डॉक्टर”। माँ मेरी तरफ़ देखती, अजीब से, जैसे ठीक से सुनाई ना दिया हो या जो सुनाई दिया वो कुछ ठीक ना लगा हो, जैसे पूछ रही हो, “सच में?” माती की दवाइयां मुझे ज़बानी याद थी। ज़्यादा थी भी नहीं, आधी ऐटीवान दोपहर को खाने के बाद, लेकिन माती उसको प्रिस्क्रिप्शन ही बोलते थे। “मेरी प्रिस्क्रिप्शन नई लब्दी”, “किथे रखी प्रिस्क्रिप्शन”, “मेरी प्रिस्क्रिप्शन लै आ”। प्रिस्क्रिप्शन तो बाबा की थी। दो ऐटीवान, एक दोपहर, एक रात। फिर मेटफ़ॉर्म लग गई शुगर के लिए। एक घरेलू चूरन पेट के लिए और फिर एक अल्प्राज़ोलाम ताकि रात को ठीक से सोएं, ताकि सुबह फटाफट उठें और ज़्यादा से ज़्यादा मरीज़ देखें।
“किन आत्मघातियों के घर आ गई,” माँ अक्सर बुदबुदाती थी। बाबा की लंबी होती प्रिस्क्रिप्शन पर, उनके अनगिनत पेड़ों पर सख्त नज़र रखतीं थीं । कहतीं “चलो खाने के बाद टहलने चलते हैं, बी.पी. के लिए अच्छा रहता है”, “थोड़ा अपने लिए भी वक़्त निकाला करो”। एक दिन फिर से कह दिया, “चलो कहीं छुट्टी मनाने चलते हैं।”
“वेटिंग रूम में बीमारों की लाइन लगी है,” बाबा ने ज़ोर से हाथ झटका के माँ की बात को परे कर दिया। जैसे मानो की माँ को ही परे कर दिया।
“वैसे मैं हरद्वार नी वेख्या,” मति बोले।
“हाँजी, ज़रूर, चलो, हरिद्वार चलिए।”
“पर तुम्हें कहाँ जाने का मन है?” माँ अपनी बात पे अड़ीं।
“हरद्वार जाएं, कहीं और जाएं, क्या फ़र्क पड़ता है?” बाबा झल्लाए और धम्म- धम्म करके कमरे में चले गए। माँ उनके पीछे गयीं, लड़ाई अंदर जारी रही।
“तुम हमेशा ऐसे करती हो।”
“तुम्हे छुट्टी की जरूरत है।”
“हरद्वार जा तो रहे हैं।”
“पर तुम्हें कहां जाने का मन है?”
“मेरी चिंता मत करो।”
“किसी को तो करनी पड़ेगी ना।”
“क्या मतलब?”
“तुम तो करते नहीं। दौड़ें चले जा रहे हो अपने पतन की ओर, गिरते-पड़ते, लुड़कते-धुड़कते, सब को साथ लिए। अपने विनाश में तुम्हें मोक्ष दिखाई दे रहा है।”
इस बात के कुछ ही दिनों बाद मन्नु चाचा आ पहुंचे। मानो ये बात उड़ते-उड़ते टोरोंटो तक गई और अपने पंखों पर बैठाकर उन्हें ले आयी। दो टिकटें हाथ में। माती को आग्रा ले जाने। इससे पहले कि बाबा कुछ करते या बोलते, माती सबसे बड़े सूटकेस में साड़ियाँ भर के तैयार हो गए।
तड़के ही निकल गए दोनों ऑटो पकड़ के। और दो दिन में वापस आ गए, व्हीलचेर में। संगेमरमर के फ़र्श पर पानी था, माती फिसलकर गिर पड़े।
“मन्नू कित्थे सी?” बाबा ने गुस्से से पूछा।
“औत्थे ई, गाइड नाल गल कर रेया सी। बाई साल लगे। बाई हज़ार बंदे।”
बाबा ने घर में एक रेल की पटरी लगवाई, नीचे से ऊपर। उस पर एक कुर्सी बिठाई। कहीं की महारानी लगते थे, जब माती उस पर बैठकर अपने कमरे तक जाते थे, पीठ एकदम सीधी, गर्दन सीधी, ऊपर जाते हुए नीचे मेरी तरफ़ देखते भी नहीं थे।
“बाई लख रुप्पइए लगाते, शाजहाँ ने।”
बाबा ने ब्रेक वाला वॉकर खरीदा। एक छड़ी ऑर्डर की, रूस से।
“बनान दे बाद सारेयां दे हथ कटते, के फेर न कोई एहो जेइ इमारत बना सके।”
बाबा गर्म सरसों के तेल की मालिशें करते रहे जब तक माती उठ के चलने नहीं लगे।
उन्होंने घर पर छड़ी के बिना चलना शुरू कर दिया। कभी-कभी जब अपनी सहेलियों के साथ सैर पे जाते, तो छड़ी के बिना चले जाते थे। शाम को जब बाबा घर आते थे तो माती के हाथ में छड़ी भी वापस आ जाती थी।
एक छोटा सा शक का कीड़ा मेरे अंदर रेंग रहा था। एक दिन भरी दोपहर में दूध खत्म हो गया और माती ने चिलचिलाती धूप में मुझे डेरी भेजा। मैंने कहा “ऐसी क्या आफ़त या गई, शाम को भी तो ला सकती हूँ,” तो पाव भर पनीर भी लाने को बोल दिया। “छेती।”
वापस आई तो माती दरवाज़े पर ही खड़े थे, दाएं हाथ में छड़ी। मैंने साइकिल दो कदम पहले टिकाकर दूध का डोल आगे किया, उनकी दाईं तरफ। उन्होंने ने अपनी लंबी-लंबी, पतली- पतली उंगलियों से छड़ी दाएँ से बाएँ हाथ में सरकाई, झुककर, दायां हाथ बढ़ाकर मेरे से डोल लिया और मुड़कर चल बने रसोई की तरफ़। माती और डोल आगे-आगे, रूसी छड़ी पीछे-पीछे, धा-दिन-ना, धा-तिन-ना। चार कदम चलकर माती रुके। नज़रों के हाशिए से देखा कि मैं देख रही हूँ की नहीं। पूरा नहीं मुड़े। छड़ी बाएं से दाएं हाथ में सरकाई और रसोई की तरफ़ चलते रहे, इस बार थोड़ा लंगड़ाकर, रूसी छड़ी आगे- आगे, माती और डोल पीछे-पीछे, ना--धा-दिन, ना--धा-तिन।
इस गुस्ताखी की सज़ा मुझे मिली, उसी शाम को मिली। मैं बाबा की उर्दू किताबें पलट रही थी तो माती ने देख लिया और हाज़िरी लगवा ली टांगें दबाने के लिए।
“बाई कमरे सन साडी कोठीच। जद पिताजी मैंनूं बुलानदे सी मालिश वास्ते, मैं पज के जांदी सी। फ़ेर वी दस मिंट लग जाने, ऐस कमरे तों औस कमरे।”
हर बार वही कहानी, हर बार एक नई कहानी।
“सूरज ते मन्नू नूं डेड कंटा लग जांदा सी, रिफ्यूजी कॉलोनी तों स्कूल जान। बस दे पैसे नई सी।”
फिर शुरू।
“मैं रातां जग के, स्वेटरां बुन के इक पुरानी साइकिल लित्ति, सत रुपैय्ये देके। ऐ नज़मां शेरां दा टाइम साड्डे कोल कित्थे ?”
“तो अपने डंडा मार के इन्हें दूर भगा दिया?”
“बांदर बड़ा चलाक ऐ। ऐथों छाल मार के ओथे बै जांदा ऐ।”
“आपने उसे मार ही क्यों नहीं डाला? काम ख़त्म हो जाता।”
माती ने करवट बदल के दूसरी टांग मेरे आगे कर दी.
*
उस साल मुझे स्कूल के लिए नए जूते चाहिए थे। माँ नानी के यहाँ थीं और माती को चलने में अभी भी तकलीफ़ थी, तो बाबा को मुझे ले जाना पड़ा। मैं खुश थी, पूछने वाली थी कि जूते लेने के बाद फ़लूदे वाली कुल्फ़ी खायेंगे क्या, मलाई और रूह अफ़ज़ा वाली? पर बाबा खिजे हुए थे। हम सुंदर अंकल की दुकान गए, रजौरी की इकलौती जूतों की दुकान। उन्होंने मेरे नाप के दो जोड़े दिखाए, एक सादा मेरे अभी वाले जूतों जैसा और एक नया डिज़ाइन जिसके बकल पर सफ़ेद फूल बना था, अंदर से पीला।
“फूल वाला ले लें?” मैंने बाबा से पूछा।
बाबा ने सर टेढ़ा करके हिलाया जैसे कह रहे हो कि “लेके ख़त्म करो”। जूतों की तरफ़ देखा तक नहीं। बार-बार दरवाज़े की ओर देखे जा रहे थे मानो कोई आने वाला हो। उनके अपने जूतों के भी चिथड़े उड़े हुए थे। अंगूठे के नीचे ठेठ पड़ गए थे। माती के खरीदे हुए जूते थे, कई साल पहले के और बाबा इन्हीं को घसीट रहे थे।
“तूं वीं इक नवा जोड़ा लै ले,” सुंदर अंकल ने बाबा को कहा, दुकानदार की तरह नहीं, एक बड़े भाई की तरह।
बाबा ने सिर हिला दिया।
“ऐ तेरे पैरां लई चंगे नई।” लड़के को ऊपर भेज कर दो जोड़े निकलवाए। फिर उसे भेजा दो कुल्फ़ियां लाने। फिर बाबा का पैर पहले जोड़े में धीरे से डाला।
“ऐ सामनों चौड़े ने।”
बाबा की नज़रें दरवाज़े पर गढ़ी थीं।
अंकल ने जूते को चारों तरफ पोले-पोले दबाया और पूछा, “ठीक ऐ?” बाबा झल्लाए और बोले, “असी चलनेयां”। तब तक कुल्फ़ियाँ या गईं। अंकल ने बाबा को दूसरा जूता पहना के, चलवा के देखा। बाबा ने कुल्फ़ी को हाथ तक नहीं लगाया, उनकी भी मैंने खा ली। ठीक थीं, पर ना उन में फ़लूदा था, ना मलाई और ना ही रूह अफ़ज़ा।
“केड़ा पसंद ऐ?” सुन्दर अंकल ने पूछा।
बाबा ने “मैनूं नई लोड़” कि रट लगा राखी थी। अंकल ने और मैंने मिलके पहला, चौड़ा वाला जूता पसंद किया। बाबा ने पैसे दिए और हम दुकान से बाहर निकले। रिक्शे का इंतज़ार कर रहे थे तो मैंने देखा कि बाबा की नज़र सड़क पार लगी किताबों कि दुकान पर जा के टिक गई थी।
“कॉमिक्स देख सकते हैं?” मैंने पूछा। बाबा ने मुझे अजीब से देखा, जैसे मैंने जानें क्या बोल दिया हो। पुरानी किताबों के ढेर में हम ऐसे घुसे कि कब दोपहर से शाम हो गई पता ही नहीं चला। बाबा दुकानदार से बातें करते रहे, कि उनके पास कौन-कौन से दीवान है, कहाँ से लिए, अगला क्या ढूंढ रहे हैं, कहाँ मिल सकता है? दुकानदार ने बाबा की कोई किताब खरीदने की बात कह दी तो बाबा हंस पड़े। वो शायद पहली बार था जब मैंने बाबा की हँसी सुनी, कहीं बहुत अंदर से निकल रही थी। मैंने भी अपनी सारी कॉमिक्स की लिस्ट दुकानदार को सुना दी, तो वो बोले, “क्या बात है, इंतिख़ाब में तो आप अपने बाबा से भी आगे हैं !” बाबा ने फिर मुझे कुछ हैरानी से देखा जैसे भूल गए हो कि मैं भी थी वहाँ पर उनके साथ। खुद दो दीवान लिए और मुझे भी दो कॉमिक्स दिलाईं । दुकानदार ने मेरे सिर पर हाथ रखकर कहा कि मैं जब मर्ज़ी उनकी दुकान पर आकर जितनी मर्ज़ी किताबें पढ़ सकती हूँ, खरीदने की चिंता ना करूँ। घर पहुँचकर हमने बाबा की खिड़की से किताबें अंदर डाल दीं, माती की नज़रों से दूर।
माँ इतने सलीके से उस घर से दूर हुईं कि मुझे भी कई सालों तक भनक नहीं हुई। बाबा को शायद कभी भी नहीं हुई। शुरू- शुरू में हम, माँ और मैं, छुट्टियों में नैनीताल चले जाते थे नानी के घर। माँ के बचपन के स्कूल की संस्कृत टीचर रिटायर हुई तो माँ ने कुछ समय के लिए वहाँ पढ़ाना शुरू कर दिया। फिर उनकी नौकरी पक्की हो गई। फिर उन्होंने मेरा दाखिला करवा दिया, क्योंकि टीचरों के बच्चों की फ़ीस माफ़ थी। धीरे-धीरे नानी का घर घर हो गया और बाबा का घर वो जगह जहाँ ख़ास मौकों पर जाया जाता है। अगर बाबा को कभी अंदेशा हुआ भी, तो जताया नहीं।
नानी के घर मैं दिनकर और मैथिली शरण गुप्त की कविताएँ पढ़ने लगी। माँ ने रामचरितमानस भी शुरू करवा दी, संस्कृत वाली। कभी कबार मैं खुद भी कुछ लिख दिया करती थी। माँ ने सब संभाल के रखा, एक गत्ते के फ़ोल्डर में, तारीख समेत। एक और चीज़ यूं बदली कि मुझे नहीं पता चला। बस इतना याद है कि एक बार फिर माँ ने पूछा कि आगे जाकर क्या बनना चाहोगी और मैंने जवाब में डॉक्टर नहीं कहा। मैंने कहा लेखक।
बाबा के यहाँ मैंने सारे दीवान पर डाले - दीवान-ए-ज़ौक, सादी का बूस्तान, मसनवी, मीर का घर का हाल, दरिया-ए- इश्क़, इक़बाल की नज़्में और बहुत से शायर थे उनकी अलमारी में। सिर्फ़ एक नाम नहीं था, वो जो मुझे सबसे ज़्यादा अज़ीज़ था, ग़ालिब।
बाबा उनको कुछ ख़ास नहीं समझते थे। एक दिन मैं टीवी पे ग़ालिब धारावाहिक देख रही थी और बाबा आ गए। टीवी की तरफ़ एक नज़र मारी और बोले “बनावटी”। दिमाग तो बहुत खराब हुआ मेरा। पर अंदर ही अंदर खुशी की हल्की से गुदगुदी भी हुई की चलो जैसे-तैसे ही सही, बाबा ने मेरी तरफ ग़ौर तो किया। और इस फ़िज़ूल से, बेचारे से ख़याल ने मेरा दिमाग और खराब कर दिया।
“असल शायर तो मीर था। ग़ालिब तो महज़ उसकी परछाई भर था,” बाबा बोले।
बात ग़लत नहीं थी। ग़ालिब ख़ुद मीर को कश्मीर कह गए थे। पर बनावटी? ग़ालिब की ऐसी बेइज़्ज़ती के खिलाफ़ मेरे मुँह से एक लफ़्ज़ निकलता, इससे पहले बाबा चलते बने।
*
एक शाम मदारी की जगह कोई दूसरा आदमी आया। खुद पैदल और उसकी बेटी, जो करीब मेरी उम्र की होगी, दो लंबे लंबे बमबुओं पर चलती हुई। मैं डर रही थी कि वो अब गिरी, तब गिरी, पर वो धीर-धीरे चलती आ रही थी और नीचे भीड़ जमा होती जा रही थी। मैं बैल्कनी में थी और वो मेरे सामने आ गई। उसके चेहरे पर धूल थी, बाल सूखे, बिखरे, आंखें भूरी। अब मैं कहां छुपती? मैं भागे के अंदर गई सिक्का लेने पर मेरे वापस आने तक वो आगे जा चुकी थी। मैं नीचे गयी उसको पिता को पैसे देने।
“आप से पहले एक मदारी आता था,” मैंने कहा।
“उसका बंदर मर गया,” वो आदमी बोला।
“कैसे?” मुझे बंदर से डर तो लगता था, पर वो था छोटा सा, मासूम सा।
“कमाई कुछ होती नहीं थी,” वो आदमी बोला। “तमाशा देखने की भीड़ लगी रहती थी पर जब पैसे देने की बारी आती तो सब चम्पत। हरामख़ोर सब के सब।” उसने मेरी आँखों में आँखें डाल के कहा।
“भूख से मर गया?” मैंने पूछा।
“कुछ ऐसा ही... छः दिन से दोनों ने एक दाना नहीं खाया था। छटी रात मदारी से रहा नहीं गया। जब बंदर की आंख लगी तो मदारी ने उसका गला घोंट दिया। चमड़ी निकाल के मांस भून के खा गया।”
मुझे पक्का यकीन था कि वो मुझसे मखौल कर रहा है, लेकिन वो कहता गया।
“चमड़ी सुखा के उसमें भूसा भर दिया है। कंधे पर बिठाकर साइकिल पे चक्कर मारता है, पैसे बटोरता है। भूसा-भरे बंदर के हाथ में डमरू दे दिया है, और उसकी सुतली अपने हाथ में रखता है। सुतली को ज़रा सा दाबता है टक-टक-टक, कूद के सलाम करता है, नमस्ते बोलता है। बंदर जैसा दिखने भी लगा है। उतना मज़ा नहीं देता, पर सीख जाएगा।”
मैंने सिक्का उसके हाथ में धरा और भाग आई ऊपर।
*
बाबा ने सारी उम्र जो पेड़े खाये, वो सब आ गए हिसाब मांगने। बाबा को अर्ली ऑन्सेट ग्लॉकोमा हो गया। उनका चश्मा मोटे से मोटा होता गया और जब और मोटे होने की गुंजाइश नहीं रही तो एक के बाद एक ऑपरेशन हुए। धुंधलाती नज़रों से जितने मरीज़ देख सकते थे, देखे और आखिरकार हार मान के, इक्यावन साल कि उम्र में, क्लिनिक अपने शागिर्द डॉ सुरेश के हवाले करके रिटायरमेंट लेने फ़ैसला लेना पड़ा।
खबर मिलते ही माँ बोलीं, “हमें बाबा के यहाँ जाना चाहिए”। क्यों, ये नहीं बताईं।
बहुत पापड़ बेलने के बाद इलाहाबाद संग्रहालय की लाइब्रेरी से ग़ालिब के कुछ बहुत पहले की चिट्ठियों के उर्दू से अंग्रेज़ी में तर्जुमे का काम मिला था। मैं इत्मीनान से करना चाहती थी, पर माँ ने ऐसी संजीदगी से दिल्ली चलने को कहा कि मैंने चुपचाप बैग पैक किया और हम चल पड़े।
डॉ सुरेश क्लिनिक के चप्पे-चप्पे से वाकफ़ थे पर फिर भी बाबा उनको हैंडओवर कर रहे थे। शनिवार को लंच रखा था स्टाफ के लिए।
“रिटायर हो कर सबसे पहले क्या करोगे,” माँ ने पूछा?
“ऐदा बस चले ते नहा-तौं के क्लिनिक चला जावे,” माती ने कहा।
तारीफ़ थी कि तंज़, कहना मुश्किल था। बाबा भी बौखलाई से हँसी हँस दिए।
“चलो कहीं चलते हैं ,” माँ ने बोला।
बाबा ठिठके।
“माती को चार-धाम कराने हैं।”
“हाँ, वो तो है पर पहले रिटायरमेंट मनाने कहीं चलते हैं।”
बाबा ने गुस्से से हाथ हिलाया। यह शायद किसी डर से।
“नैनीताल चलो। तुम्हें पहाड़ों में मज़ा आता है ना?”
“और तुम्हें मज़ा आता है मेरे पीछे पड़ने में।”
दो- तीन दिन बाद मन्नू चाचा भी आ गए और आते ही बोले की माती को घुमाने ले जा रहे हैं। बाबा के चेहरे पर गुस्से के काले बादल छा गए।
“दूजी टंग कित्थे तुड़वानी ऐ?” माती से पूछे।
बाबा कुछ बोल पाते इससे पहले ही माती बोले “चार ताम वेखे बगैर मैं नई मरना।”
“कल चलदेआं।”
बाबा के मुँह से चूं तक नहीं निकली। बड़ी मुश्किल से एक कदम के आगे दूसरा कदम रख कर, बड़ी मशक्कत से एक सांस के बाद दूसरी सांस खींचकर, धसक-धसक कर के अपने कमरे को चले। माँ गई उनके पीछे। कुछ तो बात थी। मैं भी गयी उनके पीछे।
“तुम्हीं ने बुलाया ना उसे?” बाबा ने पूछा।
“ये उसकी माँ का घर है, उसे किसी के न्योते की ज़रूरत थोड़े ही है।”
“हमेशा ऐसे करता है,” और फिर फुसफुसाकर बोले, “हरामख़ोर।”
“और जो मर्ज़ी कह लो पर उसने कभी किसी का हिस्सा नहीं खाया।”
“तुम भी उसी की तरफ़दारी करती हो।”
“उसकी नहीं, तुम्हारी। मैं भी, मन्नू भी। हम सब तुम्हारी तरफ़दारी करते हैं,” माँ बोली। “बस एक ही है जो तुम्हारे बारे में नहीं सोचता।”
“माती को कुछ नहीं कहना,” बाबा ने आवाज़ तेज़ करके कहा।
“मैं तो तुम्हारी बात कर रही थी,” माँ बोलीं।
“अठारह साल का था मैं, मेरी नज़्में चुरा लीं उसने।”
“तुम अपने शब्दों को, अपने अंदर के कवि को मोटी-मोटी डॉक्टरी की किताबों के तले दबा रहे थे। मन्नू ने उन्हें बाहर निकाला कि वो सांस लें। उनमें जान फूँकी ताकि तुम उन्हें जीने दो।”
बाबा बुड़बुड़ाए। इतनी ज़ोर से है की उनको खांसी आ गई।
“उसने कभी भी कहा कि वो नज़्म उसने लिखी है?”
बाबा अपने आराम कुर्सी में और धंस गए।
“इतनी सुन्दर नज़्म थी।”
“तुमने पढ़ी?” बाबा की आवाज़ में घबराहट थी।
“कई बार,” माँ बोली। अपनी अलमारी से गत्ते का फ़ोल्डर निकाला, मेरे वाले जैसा लेकिन उससे बहुत पुराना। उसमें अखबार से कटी हुई एक नज़्म थी, तेंतीस साल पुरानी। पीली पड़ गई थी, बीच से फटी हुई। किसी ने उसे टेप से जोड़ा था।
ख्वाब
कल रात
तुम मेरे ख्वाब में आईं।
मैंने चाय बनाई,
तुमने कहा कुछ सुनाओ, बढ़िया सा।
और मैंने तुम्हें सुनाया एक बढ़िया सा ख्वाब
जो मैंने कल रात देखा।
चाचा और माती अगले दिन तड़के ही निकल गए।
बाबा नीचे आए, नहा-धो के, शेव कर के, बालों में तेल, बाँहों के नीचे पाउडर लगा के। नाश्ता किया, चाय पी, अखबार छाना और ब्रीफ़केस उठा के तैयार। पर जाएं कहां? वहीं, क्लिनिक, ये बोल के कि “ज़रा देख आऊं सुरेश को”। दोपहर को खाने के वक़्त घर वापस आ गए। हम तीनों ने साथ खाना खाया। माता की किचकिच के बिना शांति थी घर में। खाने के बाद बाबा ने हाथ धोए और फिर वहीं खड़े रह गए सिंक के पास। क्योंकि असल बात तो ये थी कि डॉ सुरेश बहुत काबिल थे, उन्हें बाबा की मदद की ज़रूरत नहीं थी। क्लिनिक को बाबा की ज़रूरत नहीं थी। माँ और मैं वहाँ क्या करने आये थे, मेरी समझ में अब तक नहीं आ रहा था।
मुझे बाबा पर नज़र रखने को कहकर माँ खुद खाना संभालने लगीं। मैं वहीं टेबल पर बैठकर अपना काम करती रही। वहाँ से लगभग सारे कमरे दिखते थे। बाबा पहले अपने कमरे में गए, फिर रसोई में। माती के कमरे में सबसे ज़्यादा वक़्त लगाए। फिर वापस हॉल में आए तो उनकी नज़र मुझ पर पड़ी, जैसे कोई अजूबा पहली बार दिखाई दिया हो अपने ही घर में।
“क्या लिख रही हो?” मुझसे पूछा।
“तर्जुमा कर रही हूँ।” सालों की रंजिश मेरे गले में धरना देकर बैठ गई ।
बाबा ने मेरी डायरी देखी, उनको पढ़ने में तकलीफ़ हो रही थी। सांस लेने में भी। हर सांस के साथ एक सीटी की आवाज़ निकल रही थी।
“ग़ालिब की पुरानी चिट्ठियाँ हैं,” ना चाहते हुए भी पता नहीं कैसे मेरे मुंह से निकल गया।
“तुम्हें हमेशा से ही पसंद था,” बाबा बोले।
यह बात याद थी उन्हें? मेरे बारे में कुछ भी मालूम था उन्हें? बरसों की प्यासी ज़मीन पर नाम के लिए एक बूंद बारिश गिर भी जाए तो क्या? अंदर ही अंदर मैं लड़ाई के लिए तैनात हो गई।
“पहले मुझे भी अच्छा लगता था,” बाबा ने मेरे पन्ने से कुछ दूर चम्मचों के स्टैंड की तरफ़ देखते हुए बोला। “फिर उसी ने मेरा तार्रुफ़ मीर से करा दिया।” अब चम्मचों से कहीं दूर देख रहे थे, कोई सुंदर नज़ारा, किसी जवान लड़के की तरह। ये डॉक्टर सूरज प्रकाश भाटिया वल्द संतोष देवी भाटिया एवं श्री हरदेव सिंह भाटिया नहीं थे। ये थे सूरज, अठारह साल के उभरते शायर।
“कुछ सुनाओ,” सूरज ने कहा।
मैं सकपका गई। सारी उम्र यही लगता रहा कि बाबा मुझे कुछ समझते नहीं, पसंद नहीं करते, मेरी तरफ़ देखते नहीं, उनके लिए मैं थी ही नहीं। मेरे पास थीं शिकायतें, बचपन की धूप में सुखाईं, जवानी की नाराज़गी में पकाईं, तारीखों सहित, खट्टी, कड़वी। अब शेर कहाँ से लाऊँ? मैंने अपनी रंजिशों की दलदल के पार, शेरों की खान को कुरेदा। बतेरे हीरे थे, पर मैं कुछ चमकता-धमकता सा ढूंढ रही थी, कुछ ऐसा जिसे सुन के बाबा को लगे कि मुझमें भी कहीं कुछ दम है। कुछ बढ़िया सा।
“देख तो दिल के जां से उठता है...” खोदा पहाड़, निकला मीर का सबसे मशहूर शेर। बनावटी शायद बाबा ने ग़ालिब को नहीं बल्कि मेरी पसंद को कहा होगा।
लेकिन बाबा की दूर देखती नज़रों में चमक सी आ गई। जैसे किसी तन्हा राह चलते को अचानक, बिन-उम्मीद, कोई हमसफ़र मिल जाए।
“ये धुआं कहाँ से उठता है?” उन्होंने अगली लाइन कही।
उनकी घड़ी से उठ रहा था।
“चलता हूँ,” बाबा बोले।
“मेरा काम देखेंगे?” घबराहट के मारे मेरी ज़बान खुद-ब-खुद चलने लगी।
“ये मेरा पढ़ने वाला चश्मा नहीं है,” बाबा बोले। “इससे ठीक से पढ़ा नई जाता।”
“सुना तो जाता है,” मैंने कहा।
बाबा की हँसी छूट गई। वही, किताबों की दुकान वाली। ये मज़ाक मेरा अपना नहीं था, एक और खूबसूरत शायर ने कभी कह दिया था। और बाबा ये जानते थे। और मैं जानती थी कि बाबा जानते थे। हँसते- हँसते हम दोनों के आँसू निकल आए। मेरे सवाल का जवाब अभी तक नहीं मिला था। अठारह साल का सूरज रुकना चाहता था, पेन्सिल लेकर एक-एक लाइन टटोलना चाहता था, एक-एक लफ़्ज़ पे बहस करना चाहता था। लेकिन डॉ एस. पी. भाटिया भी वहीं खड़े थे। बोले “मरीज़ों की लाइन लगी है”। मैंने लंबी सांस ली, पर र वो नाराज़गी जिसने सालों से मेरे दिल में घर कर रखा था, उस दिन नहीं आई।
अगला दिन भी वैसा ही गुज़र रहा था। बाबा सुबह क्लिनिक गए, दोपहर को घर आए और खाने के बाद फिर से बेवजह एक कमरे से दूसरे कमरे में टहलने लगे। अपने कमरे से माँ का फ़ोल्डर ला कर मेरे सामने रख दिया, और धम्म से सोफ़े पर बैठ गए।
“मैं भी कभी लिखता था,” हांफते हुए बोले।
“फिर?” मैंने पूछा।
“किसी ने मेरी नज़्में चुरा लीं,” माँ की ओर मुँह करके बोले जैसे कह रहे हो ‘अब बोलो’।
माँ ने उनको यूं देखा जैसे वो अपनी क्लास के ज़िद्दी बच्चों को देखती थीं, जैसे कह रही हों कि ‘मैं तुम्हारी मदद कर सकती हूँ, अगर तुम करने दो, तो’।
“नज़्में कोई चुरा भी ले, नज़्मगोई तो कोई नहीं चुरा सकता,” मैंने कहा।
मेरी बात ने बाबा को परेशान कर दिया। उनकी भौंहें सिकुड़ने लगी।
“माती को ले गया।”
अब बाबा दस साल के बच्चे की तरह बात कर रहे थे।
“मैं लै जान लगा सी।”
“वो इसलिए ले गया ताकि तुम्हें न ले जाना पड़े।”
“हुन ते मैं फ़्री होयां।”
“इसीलिए तो। वो चाहता है की तुम फ़्री रहो, हमेशा इसी कोशिश में लगा रहा।”
बाबा चुप रहे।
“हम सब इसी कोशिश में लगे रहे।”
“हमेशा उसकी तरफ़दारी करती हो।”
माँ ने हार में सिल हिलाया।
बाबा मेरी तरफ़ मुड़े।
“कुछ सुनाने वाली थीं तुम?”
मेरे दिल ने खुशी से कलाबाज़ी मारी और मेरे मुँह से क्या निकला?
“क्लिनिक नहीं जाना आपको?”
माँ बुदबुदाईं, “स्वविध्वंस की प्रवृत्ति पीढ़ी दर पीढ़ी सुदृढ़ होती चली जा रही है इस परिवार में।”
बाबा ने हाथ हिलाकर मेरी बात परे कर दी।
“अच्छा, पर पहले आप अपनी पसंद का कुछ सुनाइए,” मैं खुद नहीं जानती थी मैं अपना काम सुनाना टाल क्यों रही थी।
“गोर किस दिलजले की है ये फ़लक”
बाबा ने पिछले दिन वाली ग़ज़ल आगे बढ़ाई।
“शोला इक सुब्ह याँ से उठता है”, मैंने शेर पूरा किया और अगला शुरू किया,
“यूँ उठे आह उस गली से हम”
बाबा ने अगली लाइन पूरी नहीं बोली।
ना हीं सोफ़े से उठे।
“जैसे कोई जहाँ से उठता है”
चाचा और माती यमुनोत्री से ही लौट आए।
“इक दिन मैं करों बार की गई,” जो सामने आ जाए, माती उसे सुनाने लगे।
मैं मन्नू चाचा से चिपककर दहाड़ें मार-मार के रोई।
“मेरा काम पढ़ने वाले थे बाबा,” मैंने सुबकियों के बीच बोला।
“उनकी आंखों में उनके अपने थे और कानों में शायरी,” चाचा ने मेरे बालों में हाथ फेरते हुए कहा। “इससे अच्छा और क्या तरीका हो सकता था भाईसाब के जाने का?”
क्रियाकर्म इतने इंतज़ाम से करवाया मां और मन्नू चाचा ने, जैसे दोनों को पता था ये होने वाला था। जैसे इसी लिए आये हों, बाबा के आखिरी पलों में उनका ध्यान रखने।
माँ ने अस्थियों को दो जगह करवाया, एक लोटा माती को दिया और एक खुद रखा।
*
अगली बार जब वो दोनों आये, तो वो लड़की सड़क पर चल रही थी और उसका पिता खंबों पे था। अब वो तीसरी मंज़िल के हरामख़ोरों तक पहुँच सकता था।
मुझे उसकी मदारी वाली कहानी पर ज़रा यकीन नहीं था।
मैं भाग के नीचे गई, एक अमरूद साथ ले गई। उस लड़की ने बिना धोए ही चक मार दी।
“तुम से पहले एक मदारी आता था,” मैंने कहा।
“मर गया वो।”
“वो थोड़े ही मरा, बंदर मरा ना?” मैंने पूछा।
उसने जीभ चटकाई।
“ छः दिन से खाना नहीं खाया था दोनों ने। बंदर बंधा हुआ था साइकिल से।”
“फिर?”
“छठी रात को जब मदारी सोया हुआ था, बंदर ने ईंटा मारके उसका सिर फोड़ दिया और दिमाग निकालकर खा गया,” खच-खच चबाते हुए बोली। ऊपर का डंडी वाला हिस्सा, नीचे का काला हिस्सा बीज, सारा खाते हुए बोली,“आंख, जीभ, नायक, कान, सब।”
“फिर?”
“फिर रस्सी काटी।”
“फिर?”
“अब ढूंढ रहा है हरामख़ोरों को, जो देखें तमाशा और दें ना पैसा।”
मेरी जेब में जितने सिक्के थे, मैंने सब उसको थमा दिये।
*
माती का जबड़ा कसा हुआ था। मैंने सरसों का तेल गर्म किया और उनके कमरे में गई।
“पिच्छे रै जानदे सी लाहौर स्टेशन ते, ऐना दे पिताजी। दो वड्डे-वड्डे बक्से सर ते चुक्के होय कताबां वाले। ती कमरेयां दी कोठीचों निरी किताबां लैके चल पये।”
मैंने तेल में उंगलियां डुबाईं और उनके घुटने पर मलीं।
“दिल्ली आई ते बक्से गायब। मैंनूं क्या तू मुंडेयां नू लै के थल्ले उतर, मैं बक्से लब के आया। मैं उतर गई, इक हथच सूटकेस, दूजेच हथच सूरज।”
“दूसरे हाथ में मन्नू चाचा,” मैंने याद दिलाया।
“दो दिन असी स्टेशन ते बालदे रए।”
“किताबों वाले बक्से कहाँ गए?”
“राती सारे सुत्ते सी ते में ट्रेन दी खिड़की चों बार सुट दित्ते। होर की कर दी?”
मेरे हाथ रुक गए।
“पर औनाने साडा पिच्छा नइ छड्डा। मन्नू निरा अपने पिताजी वाकन, शकल, अवाज़, एन। सूरज अठारा साल दा सी ते नज़्मां लिखन लगा।”
“आप फिर भी मन्नू चाचा को ज़्यादा प्यार करते थे।”
“सूरज नूं ते नई ना औस रास्ते जान दे सकदी सी। इक दिन सूरज स्कूल सी, ते मैं औदी नज़मां वाली डायरी तकिये थालों कड के साड़ छड्डी।”
रात के अंधेरे में बाबा के छुप- छुप के लिखे हुए नाज़ुक, शर्मीले खयाल, दिन के जलते उजाले में झुलस गए।
“लिखदा वदिया सी।”
“आपने बंदर को कभी अच्छे से नहीं मारा?। जान से मार देते तो कभी वापस नहीं आता।”
“पैला इनाम जीतेया सी, पूरे दस रुपइय्ये।”
“आपको बंदर अच्छा लगता था, प्यार करते थे आप बंदर को।”
“जद ऐना दे पिताजी सुर लागानदे सी, पक्षी वी चुप करके बै जानदे सी सुनन वास्ते।”
हर बार एक नई कहानी, हर बार वही कहानी।
अंग्रेज़ी संस्करण: https://www.thealephreview.com/post/tamasha



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